Thursday, May 2, 2019

30 अप्रैल 2019 यानि 56वे जन्मदिवस पर...कुछ यादें...


      सालगिरह का गोला

जहाँ तक मुझे याद है, यह उम्र 4-5 साल की रही होगी । जब हर साल की तरह 30 अप्रैल के रोज़, बिजनौर से तकरीबन 9 किलोमीटर  दूर, कस्बा झालू के मोहल्ला कानूनगोयान में मास्टर चंडी प्रसाद भारद्वाज के घर एक उत्सव का माहौल होता था । हो भी क्यों नहीं, मास्टर साहब के इकलौते बेटे का जन्मदिन जो होता था 30 अप्रैल को!!
आंगन से लेकर बाहर चबूतरे तक गोबर से लिपवाना, साफ-सफाई करवाना और नाइन ताई सहित, पंडित ताऊ जी को याद दिलाना.... यह सब काम दादी के जिम्मे था । और इतना ही नहीं, पूरे घर की एकमात्र कंट्रोलर दादी ही थी। मजाल है कि बिना दादी के के हुकुम के मां कोई जरा-सा भी अपनी मर्ज़ी से काम कर दे। पिताजी तो मुरादाबाद के किसी सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापक थे। हां, इतना मुझे जरूर माँ ने बताया था कि जब मेरा जन्म हुआ, तब वे मूंढापांडे में पोस्टेड थे । फुरसतभरी दोपहरी में अम्मा अक्सर उन मीठे दिनों की चर्चा विस्तार से किया करती थी, जब दादी के विरोध के बावजूद, माँ 5-6 महीने मूंढापांडे में भुस से आधी भरी किराए की कोठरी में पिताजी के संग रही। कुल मिलाकर वे ही पाँच-छःमहीने माँ के जीवन के यादगार दिन थे, बाक़ी जीवन तो दादी के साथ, या फिर अकेले ही गुज़ारा माँ ने ।

ख़ैर, सच कहूं तो मुझे भी बहुत इंतजार रहता था 30 अप्रैल का । उसके कई कारण थे,  मेरा जन्मदिन तो था ही। हर जन्मदिन पर मुझे बिल्कुल नए कपड़े पहनने को मिलते थे।  साथ ही, छुट्टी लेकर पिताजी मेरे जन्मदिन पर जरूर आते थे।  उस दिन घर में पकवान बनते थे। सत्यनारायण भगवान की पूजा होती थी और शाम को नाइन ताई के नेतृत्व में मोहल्ले की सभी ताई-चाची और दीदियाँ ढोलक और मजीरे के साथ जन्मोत्सव के लोकगीत गाती थी। तब वाक़ई,  आंगन में इधर से उधर तक गर्व से चहलकदमी करते हुए, खुद को एक राज कुमार  जैसा अनुभव होता था। सभी का आशीष । खासतौर पर तिलक । सबसे पहला तिलक दादी करती थी। उसके बाद ताऊ जी ( जो हमारे पुरोहित भी थे वही घर में पूजा हवन आदि सारे कर्म संपन्न कराते थे ), फिर पिताजी, उसके बाद अम्मा.... और कई बार..मोहल्ले की कोई ताई या मिथलेश दीदी भी तिलक और उपहार देतीं थीं। मुझे याद है, मिथिलेश दीदी ने ही मुझे मजबूत गत्ते की रंगीन वर्णमाला की किताब दी थी, जिसे अपनी किशोरावस्था तक कई बार सिलकर भी मैंने सहेज कर रखा। मेरा "मनोज" नाम भी 'हकली ताई' की बिटिया, हेम दीदी की ही देन है। उस जमाने में ऐसे नाम कहाँ रखता था कोई ? मेरा भी जन्म कुंडली के मुताबिक नाम- दीनानाथ सुझाया गया था। "पाधा" बाबा जी ने तब ऑप्शन में  दीनदयाल या दीपक नाम रखने की सलाह भी दी थी। लेकिन चूँकि जन्म के बाद ही मेरा 'कन-छेदन' हुआ था, इसलिए घर का पुकारने वाला नाम मेरा "कन्नू" ही प्रचलित था। इतना ही नहीं, माँ को भी सब "कन्नू की अम्मा" और दादी को "कन्नू की दादी" से ही ज्यादा जानते-पहचानते थे। हालांकि, पिताजी और माँ मुझे प्यार से "मुन्ना" कहते थे। मुन्ना नाम माँ की साँसों में किस क़दर रचा-बसा था, इसका अंदाज़ा इससे ही लगाया जा सकता है,कि जीवन के अंतिम दिनों में भी माँ के मुँह से "मुन्ना" नाम ही निकलता था।

बहरहाल, तिलक करने के साथ दोनों हाथों से सर पर आशीष का हाथ फिराना मुझे 'इरिटेट' करता था, सरसों का तेल खोंस कर सँवारे गए सिर के सारे बाल बेतरतीब हो जाते थे, लेकिन अगले ही पल ये सारी इरिटेशन रफूचक्कर हो जाती, जब सामने थाल में रखी मिठाई,पेड़ा या बर्फी अपने हाथों से खिलाकर,  उपहार में दो या पांच रुपये मेरी हथेली में आते। मुझे याद आता है,  बचपन में हर साल जन्मदिन पर दस, बारह या हद से हद पन्द्रह  रूपए की खासी रकम तो भेंट में मुझे मिल ही जाती थी । यह अलग बात है कि इतनी बड़ी रकम मेरे जैसा छोटा राजकुमार अपने किस खजाने में रखता ? लिहाजा,  यह सब रक़म अम्मा की अलमारी में रखी,  नालुये से बुनी हुई कतनी के भीतर, अफगान स्नो के खाली डिब्बे में सुरक्षित रख दी जाती थी। लेकिन मुझे इससे कोई शिकायत नहीं थी । मुझे तो चाहिए थे चंद पैसे, जिनसे मंगला हलवाई की दुकान पर पेड़ा खा सकूं या तोते चाचा के ठेले पर बर्फ़ के रंगीन गोले चूस सकूँ। और सच्ची,, उस उम्र में इतने पैसे शान से ख़र्च करने की बरक़त तो हमेशा बनी ही रही।
30 अप्रैल को सुबह ही अच्छे से नहला-धुला कर, सिर पर सरसों का तेल चुपड़ने के अलावा तेल सने हाथों से चेहरा और हाथ-पाँव चमका देना माँ की अतिरिक्त ख़ूबी थी। मैं उस दिन हमेशा नहाने की जल्दी करता था ताकि नए कपड़े पहन कर इठला सकूँ। लेकिन दादी पहले कोरे कपड़े आँगन के पेड़ों को पहनाती थी, फिर वहाँ से उतार कर मुझे पहिनने को मिलते थे। दादी कहती थी, बड़ी दुआओं से पाया है तुझे। तभी तो शुरू के 3 साल तुझे घर के कपड़े भी न पहिनाए। सच में, मेरे लिए कपड़े काशी की बहू( घर की मेहतरानी) ही लेकर आती थी। दादी बताती थी, मेरी बड़ी बहिन-बबिता की मौत छः महीने की उम्र में ही हो गई थी। उसके 3 साल बाद बड़ी मान-मनौती के फलस्वरूप भगवान ने मुझे माँ की गोद में दिया था । इसलिए ये टोटके जरूरी हैं।
ख़ैर, तैयार हो जाने के बाद अगली कड़ी होती थी तुलादान की। नीम की बीच वाली डाल पर बाज़ार वाली ताई का लड़का,  रमेश की चक्की से लाई बड़ी-सी तराज़ू लटका देता था। तराज़ू के एक पलड़े पर मुझे बैठाया जाता और मेरे वज़न के बराबर सात तरह का अनाज एवं सप्त धातु मिलाकर चढ़ाए जाते। कांटा बराबर होने पर दादी मुझे अपनी गोद मे उठा लेती और पलड़े पर रखी सभी सामग्री चवन्नी की दक्षिणा के साथ , दरवाज़े पर पहले से इंतज़ार कर रहे भिक्षुक को दे दी जाती। वो उपहार में तो
मुझे कुछ नहीं देता, बस अपने दोनों हाथों से मेरे सिर के सँवरे हुए बाल जरूर बिगाड़ देता । लेकिन फिर भी यह सब मुझे बहुत अच्छा लगता था। सच में,  जब मैं 10 साल का हो गया ,  तब तक मेरे वजन के बराबर तुलादान पिताजी हर साल कराते रहे । दस सालों तक राजसी ठाठ के बाद माँ-बदौलत के खेलने के लिए छोटी बहिन का जन्म हुआ-मंजू। फिर एक भाई-मनीष(जो अब इस दुनिया मे नहीं है),एक और बहिन-मृदुला । उसके बाद के न जाने कितने वर्षों तक तुलादान तो नहीं हुआ,  लेकिन हाँ,  दान की यह रस्म बराबर जारी रही, जब तक कि पिता जी जीवित रहे। 1995 में पिताजी के जाने के बाद जन्मदिन तो जैसे भी करके मनाया ही मैंने,, लेकिन वो राजसी भाव, वो दान, वो नए कपड़े, वो हवाओं में घुला प्यार मनुहार का अहसास फिर कभी मयस्सर नहीं हुआ।
अरे हाँ, एक गहरे राज़ की तो बताना ही भूल गया। मैं जिसे तब से जन्मदिन, जन्मदिन कहे जा रहा हूं। इस पूरे समारोह को हमेशा वर्षगांठ या सालगिरह के नाम से ही सब लोग जानते रहे। वर्षगांठ क्यों या सालगिरह क्यों ? इसके पीछे भी एक छोटी-सी कहानी है।  तुलादान हो जाने के बाद, जब ताऊ जी सत्यनारायण की पूजा करते थे और हवन कराते थे, उसी समय माँ क्रोशिया के बने हुए जालीदार एक रूमाल में बंधा  लाल रंग की डोरी का गोला पूजा में रख देती थी। पूजा संपन्न होने के बाद, ताऊजी उस रुमाल को खोलते । लाल रंग की उस डोरी से पांव के अंगूठे से लेकर सिर की शिखा तक मेरी लंबाई की नाप लेते और डोरी में उस जगह पर एक गांठ लगा देते। इतना ही नहीं, उस लंबाई से पिछले साल लगी हुई गांठ को नाप कर यह अंदाज़ा लगाया जाता कि इस 1 साल में मेरी लंबाई कितनी बढ़ी है । बाद में एक बार, उन्हीं गाँठों को गिन कर मैंने अपनी उम्र का सही अंदाजा भी लगाया था । गोले में  जितनी गांठे उतने ही साल का मेरा मुन्ना !! 

बाद के सालों में न जाने कब मेरी लम्बाई बढ़नी बन्द हो गई तो साथ-साथ, उस वर्षगाँठ के डोरे में गाँठ लगनी भी बन्द हो गई। माँ के रहते, उनकी अलमारी में वह लाल रंग का गोला,उसी जालीदार रुमाल में बंधा रखा ही रहा। माँ के जाने के बाद, जैसे कई पीढ़ियों पुराना  वह घर बिखर गया, उसी आंधी में सालगिरह का वह गोला भी न  जाने कहां चला गया। हर साल 30 अप्रैल को एक बार तो ज़रूर ढूंढता हूं सालगिरह के उस लाल गोले को.....ताकि एक बार फिर से गिन सकूँ उन तमाम गाँठों को और लगा सकूं अपनी उम्र का सही-सही अंदाजा ....!!!


- डॉ0मनोज अबोध

एक शेर और देख लीजिए न ....


एक शेर...ख़ास आपके लिए !!!!!


एक शेर....आपकी यादों की नज़्र..


रंग पर्व की रंगभरी शुभकामनाएं


14 फरबरी को कायरतापूर्ण पुलवामा हमले पर...



प्रेम दिवस की शुभकामनाएं


एक दोहा..


Wednesday, September 12, 2018

Tuesday, February 20, 2018

एक व्यथा कथा

आख़िरकार उसे बचाया नहीं जा सका......

जी हाँ, एड़ी चोटी के जोर लगाए.....ये डॉक्टर कभी वो डॉक्टर....ये अस्पताल तो कभी वो अस्पताल...मग़र अंततोगत्वा, खोना ही पड़ा एक प्रिय साथी !!! तक़रीबन 45-46 सालों का मुसलसल साथ....हर वक़्त... खाने में पीने में..सोने में..जागने में..हँसने में..खिलखिलाने में...कैसे....आख़िर कैसे मैं अपने इतने निकट..इतने प्रिय को यूँ ही बीमार रह कर तिल-तिल मरने देता । हालाँकि, उसकी इस हालत के लिए कहीं न कहीं मैं ही जिम्मेदार हूँ। सो, अपनी अपराधबोध मुक्ति के लिए या कि उसके जुदा होने के खौफ़ के चलते ही उसे स्वस्थ करने के लिए बाक़ी सभी ज़रूरी काम एक तरफ़ कर, पिछली 23 जनवरी से सतत डॉक्टर, अस्पताल के चक्कर लग रहे थे। वैसे, उसके गम्भीर रूप से बीमार होने का सप्रमाण पता 19 जनवरी को ही लग गया था। लेकिन अच्छे डॉक्टर का अपॉइंटमेंट लेने में 2-3 दिन लग ही गये।
मृदुभाषी, सुन्दर सी लेडी डॉक्टर रूचि प्रियदर्शनी (हालाँकि पहली विज़िट में चेहरे पर मॉस्क लगाये सुंदरता का सुनिश्चित उदघोष तो सम्भव नहीं था, पर देहयष्टि, आँखें आदि से यह तय था कि वह प्रियदर्शनी ही थी) ने बेहद रोषभरे स्वर में कहा- इतनी अच्छी पर्सनैलिटी और ये हाल इसका....मेरे पास अपनी लापरवाही का कोई माकूल जवाब नहीं था। प्रारम्भिक चेकअप के बाद उसने सांत्वना दी--बचाने की पूरी कोशिश करेंगे हम लोग.. बाक़ी तो ..बस..। अस्तांचल की ओर बढ़ते मेरे उम्मीद के सूरज में तनिक रौशनी का सूत्रपात हुआ। ख़ैर, एक्स रे पर एक्स रे.... एक्सपर्ट ओपिनियन... सीनियर डॉक्टर ने मुँह पिचकाते हुए कहा-- हूँ..उम्मीद तो कम ही है....... ....इंफेक्शन पूरी तरह फैल चुका है। फिर भी, एक बड़े एक्स रे के लिए रैफर करने पर सहमति बनी। जबकि ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू ही होने वाली थी, लोकल एनस्थीसिया दे दिया गया था। फिर वापसी.... महिला डॉक्टर ने अफ़सोस जताया, सॉरी, आज एनस्थीसिया इंजेक्शन यूँ ही झेलना पड़ा आपको।उम्मीद तो 10 परसेंट से ज्यादा नहीं है, फिर भी एक बार कोशिश में क्या बुराई है।  डॉ0डोडा का लैब है करोलबाग में, मेट्रो पिलर 115 के सामने। फिर, रिपोर्ट के बाद देखते हैं... चिंता न करें, बचाने की पुरजोर कोशिश की जाएगी.।।
सोचा, 69वां गणतंत्र है, ये तो मना ही लें, अब जो होना है सो एक दिन बाद...चलो, 27 जनवरी को ये भी हुआ.... रजिस्ट्रेशन...टोकन...पेमेंट.... बड़ा सा कमरा...बड़ी सी मूविंग एक्सरे मशीन...दुबली पतली सी दक्षिण भारतीय एक्सरे टेक्नीशियन....29 को रिपोर्ट के साथ फिर वहीँ चित्रगुप्त रोड वाले वेलनेस सेंटर आया।  लंच चल रहा था, डॉक्टर का समर्पण देखिये...सब्जी में डूबी उँगलियों से ही एक्सरे छत की ओर किया और, ,,, खाना भकोसती साथी डॉक्टरों की ओर देखती हुई बुदबुदाई.....उंहुं... नो चांस...। फिर बोली, आप जरा बाहर वेट करिए.. अभी बताते हैं।
चैम्बर से बाहर आ गया...क्या बताते हैं... बता तो दिया... ख़ैर, कुछ देर बाद मुझे भीतर बुलाकर एडवाइज की गई, यहाँ तो पॉसिबल न है, किसी बड़े गवर्मेंट हॉस्पिटल के लिए रैफर कर रही हूँ...बोलिये, आर एल एल या फिर जहां भी आपको ठीक लगे। बस्स... एक हफ़्ते की भाग-दौड़ दफ़्तर से छुट्टी...पैसा ख़र्चा... अब सरकारी बड़े अस्पताल जाओ। शायद, इसी पचड़े के कारण मोटे पैसेवाले लोग सीधे थ्री-फोर स्टार प्राइवेट हॉस्पिटल का ही रुख़ करते हैं।
ऐसे ही वक़्त में दोस्तों की याद आती है, याद आया, डॉ0संजय कँवर का, व्हाट्स एप पर फ्रेंड हैं... पिछली बार पांचेक साल पहले अम्बेडकर अस्पताल में भेंट हुई थी। धर्म राजनीति पर व्हाट्स एप पर ख़ूब फारवर्ड-फारवर्ड खेलते हैं हमलोग....डॉ0साहब बीजेपी के धुर विरोधी.... उनका बस चले, तो हर भगवा को तड़ीपार कर दें। पर, मतलब अपना था, सो फोन किया, मिलने का वक़्त माँगा। अब 2 फरबरी आ गई थी, बोले एक्सरे देखकर ही कुछ बताऊंगा, अब मैं भगवान महावीर हॉस्पिटल पीतमपुरा में हूँ ।  चलो पहले पूछ लिया, वरना मैं तो अम्बेडकर में ही ढूंढ़ता, ओह! सरकारी डॉक्टरों के भी तो तबादले होते हैं।
पहले दिन पहुँचने में देर हो गई, ओपीडी रजिस्ट्रेशन 12 बजे बन्द हो चुका था। कमरा न0112 में घुसा तो डॉ0साहब लंच के लिए जा रहे थे शायद...बेमन से नमस्ते हुई। चेहरे के भाव कुछ यूँ रहे होंगे...चल दिए मुँह उठा कर.. डॉक्टर तो जैसे इनके बाप का नौकर है... उसे खाने पीने का हक़ कहाँ है...।   मैं इंतज़ार करता हूँ डॉक्टर साहब...कोई बात नहीं। अरे नहीं, आप बैठिये, मैं अभी आता हूँ, कहकर बन्दा निकल लिया। आधा घण्टे बाद अवतरित हुए, एक्सरे देखा तो तपाक से बोले, कोई फायदा नहीं। इसे जाना ही होगा। ऐसा करो, मंगल को आ जाओ... मैं करता हूँ। फिर एक नज़र मेरे उदास चेहरे पर डालते हुए बोले, ये दवाई 3-4 दिन ले लो... लिख दूँ ? मेरे मुँह में अल्फ़ाज़ न थे, सर हिला दिया सहमति में। भारी कदमों से वापिस आ गया। अब कोई उम्मीद न बची थी। ख़ैर, अब और क्या किया जा सकता है!!
दिल्ली के सरकारी अस्पताल के ओपीडी की लंबी क्यू से ख़ौफ़ खाकर सोमवार से ही ऑन लाइन रजिस्ट्रेशन के लिए यूजर आईडी बनाई,  6 फरबरी सुबह 7 बजे से ही कोशिश करके जैसे-तैसे रजिस्ट्रेशन हुआ। ऑफिस से सबकी शुभ कामनाएं लेकर निकला, फिर भी 12 बजे पहुँच पाया। इस पूरे दौरान एक व्यक्ति जो हर पल मेरे साथ परेशान और चिंतित रहा वो सिर्फ़ बब्बू ही था और दूसरा मैं...। प्रारम्भिक औपचारिकताएं.... कन्सेंट के दो पेज के छपे फार्म पर दस्तख़त ले लिए। घर का पता, पिता का नाम...वग़ैरह वग़ैरह... कुछ ऊँच-नीच हो तो किसे ख़बर करें...। डॉ0 संजय अपने जूनियर डॉ0को बीपी, एनस्थीसिया और बाक़ी डॉक्टरी भाषा में निर्देश देकर..कि तब तक मैं आता हूँ, निकल लिए। ख़ैर, 3-4 इंजेक्शन ठोक कर डॉ0ने एक नुकीला औज़ार चुभाते हुए पूछा--लग तो नहीं रहा है न ?? अब भैया, लग भी रहा होगा तो क्या कर लूँगा। मैंने निरीह भाव से सिर हिलाया। अब तो पूरी ताक़त से डॉ0 जुट गया, इधर कट तो ब्लड ही ब्लड... बीच  बीच में मेरी पीड़ा का अनुभव करते हुए पूछता- खिंचाव ज्यादा तो नहीं हो रहा.... और फिर  से प्रयास में जुट जाता। आधा घण्टे में मित्र डॉ0 संजय भी लौट आये--कहाँ तक पहुँचे??? ओके..गुड.. फिर कुछ पलों के लिए हरे पर्दे के उस पार अपने किसी सहयोगी से राजनीतिक चर्चा में लग गए-- ताज महोत्सव में राम लीला...भला ये भी कोई तुक है..ये देश का सत्यानाश कर के ही दम लेंगे...फिर भीतर आये । चलो छोड़ो, तुम लंच करो, मैं ही करता हूँ... तुमसे नहीं होगा। और, मॉस्क चढ़ाकर, ग्लव्ज़ पहिनकर संजय कँवर जी औज़ारों के साथ झुक गए। एक अदना से बीमार कमज़ोर दाँत की इतनी ज़ुर्रत.... डॉक्टर फुल फॉर्म में थे और मैं भगवान को याद कर रहा था। कुछ देर की जद्दो-जहद के बाद... पूरी ताक़त से ... जम्बुड़े की गिरफ़्त में लहूलुहान दाँत हवा में लहरा रहा था। उन्होंने गर्व से जूनियर डॉक्टर की ओर देखा... चलो, ड्रेसिंग कर दो।
उफ़्फ़... हर ख़ुशी हर दुःख की साथी ... खून से लथपथ वह मेरी दाढ़...बेजान सी में वेस्ट ट्रे में पड़ी छटपटा रही थी... कुछ हफ़्तों के साथी के बिछुड़ने पर भी अफ़सोस होता है...यह साथ तो 40-45 सालों से भी लम्बा था। मैंने एक गहरी निःश्वास ली। चेहरे की सूजन बता रही थी कि मक़तूल ने खुद को बचाने के लिए,  कितनी बड़ी लड़ाई लड़ी है डॉक्टर और हथियारों से...मैंने हल्के से वाश बेसिन में खून के धब्बे साफ़ किये और भारी क़दमो से धीरे-धीरे बाहर आ गया।  ये ज़ख्म भी भर जायेगा जो अभी हरा है... पर जो मेरी अपनी लापरवाही से हमेशा के लिए बिछड़ गया उसके यूँ जाने का दुःख अर्से तक सालता रहेगा, ये तय है.....।
--------- मनोज अबोध   6  फरबरी 2018