Saturday, October 20, 2012

पुस्‍तक परिचय: कुंवर कुसुमेश द्वारा


पुस्तक परिचय
                                                
पुस्तक का नाम    : मेरे भीतर महक रहा है(ग़ज़ल संग्रह)      ग़ज़लकार : मनोज अबोध 
प्रकाशक          : हिंदी साहित्य निकेतन,बिजनौर          मूल्य  :150/-
प्रकाशन वर्ष       :   2012                                                               पृष्ठ   :96

पिछले लगभग तीन दशकों के दौरान हिंदी में ग़ज़ल के कई संग्रह नज़र से गुज़रे।हिंदी में ग़ज़ल कहने वालों की संख्या में न सिर्फ ज़बरदस्त वृद्धि हुई है बल्कि बहुत अच्छे ग़ज़ल संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं, और हो रहे हैं। इसी श्रृंखला में जनाब मनोज अबोध जी का ताज़ा-तरीन ग़ज़ल संग्रह,मेरे भीतर महक रहा है, मेरे हाथों में है।यह इनका दूसरा ग़ज़ल संग्रह है।वर्ष 2000 में प्रकाशित इनका पहला ग़ज़ल संग्रह,गुलमुहर की छाँव में,काव्य जगत में हाथों-हाथ लिया गया।
प्रस्तुत ग़ज़ल संग्रह,मेरे भीतर महक रहा है, में मनोज जी ने ग़ज़ल के रिवायती अंदाज़ को बरक़रार रखते हुए रूमानी अशआर कहे हैं, तो मौजूदा हालात पर भी क़लम बखूबी चलाई है।
रूमानी अंदाज़ में शेर कहते हुए मनोज कहते हैं कि :-
कुछ वो पागल है,कुछ दीवाना भी।
उसको जाना मगर न जाना भी।
आज पलकों पे होठ भी रख दो,
आज मौसम है कुछ सुहाना भी।- - - - - -  पृष्ठ-27
रूमानी अशआर कहते वक़्त मनोज अबोध की सादगी भी क़ाबिले-तारीफ है।देखिये :-
प्रीत जब बेहिसाब कर डाली।
जिंदगी कामयाब कर डाली।
बिन तुम्हारे जिया नहीं जाता,
तुमने आदत खराब कर डाली। - - - - - - -पृष्ठ-43
मुश्किलों से न घबराते हुए अपना आशावादी दृष्टिकोण रखते हुए ग़ज़लकार  कहता है कि :-
तमाम मुश्किलों के बाद भी बचेगा ही।
तेरे नसीब में जो है वो फिर मिलेगा ही।---पृष्ठ-26
हालाँकि एक शेर में आगाह भी करते हुए चलते है कि :-
फूल ही फूल हों मुमकिन है भला कैसे ये ?
वक़्त के हाथ में तलवार भी हो सकती है।- -पृष्ठ-93
बहरे-मुतदारिक सालिम में कही गई ग़ज़ल-32 के दूसरे शेर का मिसरा-ए-सानी "बिटिया जब से बड़ी हो गई" ताक़ीदे-लफ्ज़ी की गिरफ़्त में है और हल्की-सी तब्दीली मांग रहा है।देखिये :- 
छाँव क़द से बड़ी हो गई ।
एक उलझन खड़ी हो गई।
फूल घर में बिखरने लगे
बिटिया जब से बड़ी हो गई। - - - -  - - - - पृष्ठ-50
इसे यूँ किया जा सकता है:-
फूल घर में बिखरने लगे
जब से बिटिया बड़ी हो गई। 
संग्रह की छपाई बेहतरीन,मुख पृष्ठ आकर्षक और पुस्तक संग्रहणीय है। मनोज अबोध जी के अशआर पढ़ते ही ज़ेहन नशीन हो जाते हैं। मैं दुआगो हूँ कि शायरी के इस खूबसूरत सफ़र पर मनोज जी ताउम्र गामज़न रहें और इसी तरह अपने उम्दा अशआर से अपने चाहने वालों को मह्ज़ूज़ करते रहें।

कुँवर कुसुमेश 
4/738 विकास नगर,लखनऊ-226022
मोबा:09415518546

Monday, August 20, 2012

ईद के प्‍यारे-मुहब्‍बतभरे मौके पर एक मुक्‍तक

Friday, August 17, 2012

एक मुक्‍तक मौसम का..आपके नाम...

हाथ में हाथ हो, हो  न हो ।
आपका साथ हो, हो  न हो ।
आज रोको न जज्‍़बात को...
फिर ये बरसात हो, हो  न हो ।।

Thursday, August 16, 2012

एक मुक्‍तक आपके नाम......

चॉंदनी  रात हो, हो, न  हो ।
आपसे बात  हो, हो, न  हो ।
चार पल पास बैठो  जरा...
फिर मुलाकात  हो, हो, न  हो ।
।

Tuesday, July 17, 2012

आज का मुक्‍तक.....


रूकती हुई सॉंसों में कुछ सॉंस मिला जाओ ।
अहसास  के पंछी को थपकी दे सुला जाओ ।
उम्‍मीद  की  राहों  में   यादों  का  उजाला  है..
अश्‍कों की गुज़ारिश है- इकबार तो आ जाओ ।

Monday, July 16, 2012

आज का मुक्‍तक....

वीणा से  जुदा  होकर  संगीत  नहीं लौटा ।
अधरों से क्‍या बिछुड़ा, फिर गीत नहीं लौटा ।
‘जल्‍दी  लौटूंगा’  ये वादा  भी  छलावा था
बॉंहों से  बिछुड़कर फिर वो मीत नहीं लौटा ।

Tuesday, June 26, 2012

आज का मुक्‍तक.....

प्रेम के अपहरण  से बचो ।
मित्र के विस्‍मरण से बचो ।
चाहते हो अगर  उच्‍चता..
भाव के संक्रमण से बचो ।

Wednesday, June 20, 2012

आज का मुक्‍तक...


क्षुद्र   अंत:करण  मत करो ।
उच्‍चता का क्षरण मत करो ।
लेखनी  के अमिट  अस्‍त्र से
मित्र पर आक्रमण मत करो ।

Saturday, June 16, 2012

एक पुराना गीत::::


आज मिले हो तुम...

आज मिले हो तुम
जैसे, बिसरे गीतों के छंद
जाग उठी प्राणों में फिर
बीते मौसम की गन्‍ध ।।



कितने अनदेखे सपने,
जब खड़े हुए थे द्वार....
कहां उठा पाई थीं पलकें
स्‍पर्शों का भार ...
पूर्ण समर्पण ही लगता, था
जीवन का सार....
जैसे, कोई मधुप हो जाए
मन-पंकज में बन्‍द ।।



मन के चिर-सूने पनघट पर
तुम ऐसे आये...
ज्‍यों युग के प्‍यासे पंथी को
सरिता मिल जाये..
श्‍वांसों में रजनीगंधा की
खुश्‍बू घुल जाये...
अब न बिछड़ना मीत, तुम्‍हे
उन यादों की सौगन्‍ध ।।



-- मनोज अबोध

Sunday, June 3, 2012

आज का मुक्‍तक

नफ़रतों को हवन हम करें ।
देश को फिर चमन हम करें ।
जो मिटे देश हित के लिए
आज उनको नमन हम करें ।

Saturday, June 2, 2012

आज का मुक्‍तक

मित्रता का जतन  हम करें ।
प्रेम-भीगा कथन  हम करें ।
जाति को, वर्ग को छोड़कर
एकता को सघन हम करें ।

Friday, June 1, 2012

आज का मुक्‍तक.....


स्‍वार्थ का हर शमन हम करें ।
भाव मन का  गहन हम करें ।
एकता- प्रेम  हो  देश  में..
आओ, मिलकर जतन हम करें ।

Thursday, May 31, 2012

आज का मुक्‍तक.....

आप,  आते हो चले जाते हो ।
हमको बिलकुल नहीं बताते हो
दोस्‍तों का खयाल भी रक्‍खो..
क्‍यों हमें इस कद़र सताते हो ।।

Wednesday, May 23, 2012

आज का मुक्‍तक


कुछ तो सोचो- विचारो  कभी ।
नयन भर कर  निहारो  कभी ।
कब से बैठे  हैं पलकों  पे वो..
अब तो दिल में उतारो  कभी ।

Tuesday, May 22, 2012

आज का मुक्‍तक.............

प्‍यार  की  साधना  के  लिए  ।
भाव  की  अर्चना  के  लिए  ।
आओ,हम-तुम मिलें आज फिर
इक  नई  सर्जना  के  लिए  ।।

Sunday, May 20, 2012

आज का मुक्‍तक...

भाव की  नवधरा  चाहिए  ।
प्राण-प्रण  से वफ़ा  चाहिए ।
मैं  अधूरा हूँ  बिन  आपके..
आप से  पूर्णता  चाहिए  ।।

Friday, May 18, 2012

आज का मुक्‍तक...


प्‍यार में फिर वफ़ा के लिए ।।
इस अधूरी  कथा के लिए ।।
है निवेदन  यही, आपसे .....
लौट आओ सदा के लिए  ।।

Thursday, May 10, 2012

आज का मुक्‍तक......


क्‍यों कसम मेरी खाते हो तुम ।
और फिर भूल जाते हो तुम ।
कब निभा पाए हो तुम वफ़ा ...
मुझको झूठा बताते हो तुम ।

आज का मुक्‍तक....

दूर ख़ुद मुझसे  जाते हो तुम ।
अश्‍क भी फिर बहाते हो तुम ।
जब मिलन चाहते  ही नहीं ..
क्‍यों  बहाने बनाते  हो तुम ।

Monday, May 7, 2012

आज का मुक्‍तक


भाव  इतने  सघन हों न हों ।
स्‍वागतम् में नयन हों न हों ।
आज ही हमसे मिल लीजिए..
फिर मिलन के यतन हों न हों ।

Sunday, May 6, 2012

आज का मुक्‍तक....



खु़द  को  यूँ  गुदगुदाओ  कभी ।
बे-वजह   मुस्‍कुराओ    कभी  ।
याद  करके  किसी  बात  को ..
खु़द-ब-ख़ुद  खिलखिलाओ कभी ।

Friday, May 4, 2012

आज का मुक्‍तक....


व्‍यक्तिगत  टिप्‍पणी,  फिर  कभी ।
हम में जो कुछ ठनी, फिर  कभी  ।
चन्‍द  पल   पास   बैठो   जरा....
आपसी  दुश्‍मनी,   फिर   कभी  ।

Thursday, May 3, 2012

मुक्‍तक

सपनों से दिल लगाना  है अच्‍छा  कभी-कभी
बस, यूं ही मुस्‍कुराना है अच्‍छा  कभी-कभी
है प्‍यार तो आएगा,  मनाने   भी वो जरूर
बे-वजह रूठ   जाना  है  अच्‍छा  कभी-कभी ।।
0000000000000000000000000000000000








आज का मुक्‍तक.......


मुस्‍कुरा  कर   सराहा  तुम्‍हे  ।
हर कदम  पर निबाहा  तुम्‍हे  ।
तुम न  समझे हृदय को मेरे ..
ख़ुद से भी ज्‍यादा चाहा  तुम्‍हे ।

Saturday, April 28, 2012

आज का मुक्‍तक


वो  मिले, पर मिले  भी नहीं ।
गुल खिले, पर खिले  भी नहीं ।
देख  लेते   थे  पहले   उन्‍हें...
अब तो ये सिलसिले  भी नहीं ।