क्या बताऊँ कि मेरे साथ वो क्या-क्या चाहे ..... वो न तितली न वो जुगनू न ही तारा चाहे........
Wednesday, February 28, 2018
Tuesday, February 20, 2018
एक व्यथा कथा
आख़िरकार उसे बचाया नहीं जा सका......
जी हाँ, एड़ी चोटी के जोर लगाए.....ये डॉक्टर कभी वो डॉक्टर....ये अस्पताल तो कभी वो अस्पताल...मग़र अंततोगत्वा, खोना ही पड़ा एक प्रिय साथी !!! तक़रीबन 45-46 सालों का मुसलसल साथ....हर वक़्त... खाने में पीने में..सोने में..जागने में..हँसने में..खिलखिलाने में...कैसे....आख़िर कैसे मैं अपने इतने निकट..इतने प्रिय को यूँ ही बीमार रह कर तिल-तिल मरने देता । हालाँकि, उसकी इस हालत के लिए कहीं न कहीं मैं ही जिम्मेदार हूँ। सो, अपनी अपराधबोध मुक्ति के लिए या कि उसके जुदा होने के खौफ़ के चलते ही उसे स्वस्थ करने के लिए बाक़ी सभी ज़रूरी काम एक तरफ़ कर, पिछली 23 जनवरी से सतत डॉक्टर, अस्पताल के चक्कर लग रहे थे। वैसे, उसके गम्भीर रूप से बीमार होने का सप्रमाण पता 19 जनवरी को ही लग गया था। लेकिन अच्छे डॉक्टर का अपॉइंटमेंट लेने में 2-3 दिन लग ही गये।
मृदुभाषी, सुन्दर सी लेडी डॉक्टर रूचि प्रियदर्शनी (हालाँकि पहली विज़िट में चेहरे पर मॉस्क लगाये सुंदरता का सुनिश्चित उदघोष तो सम्भव नहीं था, पर देहयष्टि, आँखें आदि से यह तय था कि वह प्रियदर्शनी ही थी) ने बेहद रोषभरे स्वर में कहा- इतनी अच्छी पर्सनैलिटी और ये हाल इसका....मेरे पास अपनी लापरवाही का कोई माकूल जवाब नहीं था। प्रारम्भिक चेकअप के बाद उसने सांत्वना दी--बचाने की पूरी कोशिश करेंगे हम लोग.. बाक़ी तो ..बस..। अस्तांचल की ओर बढ़ते मेरे उम्मीद के सूरज में तनिक रौशनी का सूत्रपात हुआ। ख़ैर, एक्स रे पर एक्स रे.... एक्सपर्ट ओपिनियन... सीनियर डॉक्टर ने मुँह पिचकाते हुए कहा-- हूँ..उम्मीद तो कम ही है....... ....इंफेक्शन पूरी तरह फैल चुका है। फिर भी, एक बड़े एक्स रे के लिए रैफर करने पर सहमति बनी। जबकि ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू ही होने वाली थी, लोकल एनस्थीसिया दे दिया गया था। फिर वापसी.... महिला डॉक्टर ने अफ़सोस जताया, सॉरी, आज एनस्थीसिया इंजेक्शन यूँ ही झेलना पड़ा आपको।उम्मीद तो 10 परसेंट से ज्यादा नहीं है, फिर भी एक बार कोशिश में क्या बुराई है। डॉ0डोडा का लैब है करोलबाग में, मेट्रो पिलर 115 के सामने। फिर, रिपोर्ट के बाद देखते हैं... चिंता न करें, बचाने की पुरजोर कोशिश की जाएगी.।।
सोचा, 69वां गणतंत्र है, ये तो मना ही लें, अब जो होना है सो एक दिन बाद...चलो, 27 जनवरी को ये भी हुआ.... रजिस्ट्रेशन...टोकन...पेमेंट.... बड़ा सा कमरा...बड़ी सी मूविंग एक्सरे मशीन...दुबली पतली सी दक्षिण भारतीय एक्सरे टेक्नीशियन....29 को रिपोर्ट के साथ फिर वहीँ चित्रगुप्त रोड वाले वेलनेस सेंटर आया। लंच चल रहा था, डॉक्टर का समर्पण देखिये...सब्जी में डूबी उँगलियों से ही एक्सरे छत की ओर किया और, ,,, खाना भकोसती साथी डॉक्टरों की ओर देखती हुई बुदबुदाई.....उंहुं... नो चांस...। फिर बोली, आप जरा बाहर वेट करिए.. अभी बताते हैं।
चैम्बर से बाहर आ गया...क्या बताते हैं... बता तो दिया... ख़ैर, कुछ देर बाद मुझे भीतर बुलाकर एडवाइज की गई, यहाँ तो पॉसिबल न है, किसी बड़े गवर्मेंट हॉस्पिटल के लिए रैफर कर रही हूँ...बोलिये, आर एल एल या फिर जहां भी आपको ठीक लगे। बस्स... एक हफ़्ते की भाग-दौड़ दफ़्तर से छुट्टी...पैसा ख़र्चा... अब सरकारी बड़े अस्पताल जाओ। शायद, इसी पचड़े के कारण मोटे पैसेवाले लोग सीधे थ्री-फोर स्टार प्राइवेट हॉस्पिटल का ही रुख़ करते हैं।
ऐसे ही वक़्त में दोस्तों की याद आती है, याद आया, डॉ0संजय कँवर का, व्हाट्स एप पर फ्रेंड हैं... पिछली बार पांचेक साल पहले अम्बेडकर अस्पताल में भेंट हुई थी। धर्म राजनीति पर व्हाट्स एप पर ख़ूब फारवर्ड-फारवर्ड खेलते हैं हमलोग....डॉ0साहब बीजेपी के धुर विरोधी.... उनका बस चले, तो हर भगवा को तड़ीपार कर दें। पर, मतलब अपना था, सो फोन किया, मिलने का वक़्त माँगा। अब 2 फरबरी आ गई थी, बोले एक्सरे देखकर ही कुछ बताऊंगा, अब मैं भगवान महावीर हॉस्पिटल पीतमपुरा में हूँ । चलो पहले पूछ लिया, वरना मैं तो अम्बेडकर में ही ढूंढ़ता, ओह! सरकारी डॉक्टरों के भी तो तबादले होते हैं।
पहले दिन पहुँचने में देर हो गई, ओपीडी रजिस्ट्रेशन 12 बजे बन्द हो चुका था। कमरा न0112 में घुसा तो डॉ0साहब लंच के लिए जा रहे थे शायद...बेमन से नमस्ते हुई। चेहरे के भाव कुछ यूँ रहे होंगे...चल दिए मुँह उठा कर.. डॉक्टर तो जैसे इनके बाप का नौकर है... उसे खाने पीने का हक़ कहाँ है...। मैं इंतज़ार करता हूँ डॉक्टर साहब...कोई बात नहीं। अरे नहीं, आप बैठिये, मैं अभी आता हूँ, कहकर बन्दा निकल लिया। आधा घण्टे बाद अवतरित हुए, एक्सरे देखा तो तपाक से बोले, कोई फायदा नहीं। इसे जाना ही होगा। ऐसा करो, मंगल को आ जाओ... मैं करता हूँ। फिर एक नज़र मेरे उदास चेहरे पर डालते हुए बोले, ये दवाई 3-4 दिन ले लो... लिख दूँ ? मेरे मुँह में अल्फ़ाज़ न थे, सर हिला दिया सहमति में। भारी कदमों से वापिस आ गया। अब कोई उम्मीद न बची थी। ख़ैर, अब और क्या किया जा सकता है!!
दिल्ली के सरकारी अस्पताल के ओपीडी की लंबी क्यू से ख़ौफ़ खाकर सोमवार से ही ऑन लाइन रजिस्ट्रेशन के लिए यूजर आईडी बनाई, 6 फरबरी सुबह 7 बजे से ही कोशिश करके जैसे-तैसे रजिस्ट्रेशन हुआ। ऑफिस से सबकी शुभ कामनाएं लेकर निकला, फिर भी 12 बजे पहुँच पाया। इस पूरे दौरान एक व्यक्ति जो हर पल मेरे साथ परेशान और चिंतित रहा वो सिर्फ़ बब्बू ही था और दूसरा मैं...। प्रारम्भिक औपचारिकताएं.... कन्सेंट के दो पेज के छपे फार्म पर दस्तख़त ले लिए। घर का पता, पिता का नाम...वग़ैरह वग़ैरह... कुछ ऊँच-नीच हो तो किसे ख़बर करें...। डॉ0 संजय अपने जूनियर डॉ0को बीपी, एनस्थीसिया और बाक़ी डॉक्टरी भाषा में निर्देश देकर..कि तब तक मैं आता हूँ, निकल लिए। ख़ैर, 3-4 इंजेक्शन ठोक कर डॉ0ने एक नुकीला औज़ार चुभाते हुए पूछा--लग तो नहीं रहा है न ?? अब भैया, लग भी रहा होगा तो क्या कर लूँगा। मैंने निरीह भाव से सिर हिलाया। अब तो पूरी ताक़त से डॉ0 जुट गया, इधर कट तो ब्लड ही ब्लड... बीच बीच में मेरी पीड़ा का अनुभव करते हुए पूछता- खिंचाव ज्यादा तो नहीं हो रहा.... और फिर से प्रयास में जुट जाता। आधा घण्टे में मित्र डॉ0 संजय भी लौट आये--कहाँ तक पहुँचे??? ओके..गुड.. फिर कुछ पलों के लिए हरे पर्दे के उस पार अपने किसी सहयोगी से राजनीतिक चर्चा में लग गए-- ताज महोत्सव में राम लीला...भला ये भी कोई तुक है..ये देश का सत्यानाश कर के ही दम लेंगे...फिर भीतर आये । चलो छोड़ो, तुम लंच करो, मैं ही करता हूँ... तुमसे नहीं होगा। और, मॉस्क चढ़ाकर, ग्लव्ज़ पहिनकर संजय कँवर जी औज़ारों के साथ झुक गए। एक अदना से बीमार कमज़ोर दाँत की इतनी ज़ुर्रत.... डॉक्टर फुल फॉर्म में थे और मैं भगवान को याद कर रहा था। कुछ देर की जद्दो-जहद के बाद... पूरी ताक़त से ... जम्बुड़े की गिरफ़्त में लहूलुहान दाँत हवा में लहरा रहा था। उन्होंने गर्व से जूनियर डॉक्टर की ओर देखा... चलो, ड्रेसिंग कर दो।
उफ़्फ़... हर ख़ुशी हर दुःख की साथी ... खून से लथपथ वह मेरी दाढ़...बेजान सी में वेस्ट ट्रे में पड़ी छटपटा रही थी... कुछ हफ़्तों के साथी के बिछुड़ने पर भी अफ़सोस होता है...यह साथ तो 40-45 सालों से भी लम्बा था। मैंने एक गहरी निःश्वास ली। चेहरे की सूजन बता रही थी कि मक़तूल ने खुद को बचाने के लिए, कितनी बड़ी लड़ाई लड़ी है डॉक्टर और हथियारों से...मैंने हल्के से वाश बेसिन में खून के धब्बे साफ़ किये और भारी क़दमो से धीरे-धीरे बाहर आ गया। ये ज़ख्म भी भर जायेगा जो अभी हरा है... पर जो मेरी अपनी लापरवाही से हमेशा के लिए बिछड़ गया उसके यूँ जाने का दुःख अर्से तक सालता रहेगा, ये तय है.....।
--------- मनोज अबोध 6 फरबरी 2018
जी हाँ, एड़ी चोटी के जोर लगाए.....ये डॉक्टर कभी वो डॉक्टर....ये अस्पताल तो कभी वो अस्पताल...मग़र अंततोगत्वा, खोना ही पड़ा एक प्रिय साथी !!! तक़रीबन 45-46 सालों का मुसलसल साथ....हर वक़्त... खाने में पीने में..सोने में..जागने में..हँसने में..खिलखिलाने में...कैसे....आख़िर कैसे मैं अपने इतने निकट..इतने प्रिय को यूँ ही बीमार रह कर तिल-तिल मरने देता । हालाँकि, उसकी इस हालत के लिए कहीं न कहीं मैं ही जिम्मेदार हूँ। सो, अपनी अपराधबोध मुक्ति के लिए या कि उसके जुदा होने के खौफ़ के चलते ही उसे स्वस्थ करने के लिए बाक़ी सभी ज़रूरी काम एक तरफ़ कर, पिछली 23 जनवरी से सतत डॉक्टर, अस्पताल के चक्कर लग रहे थे। वैसे, उसके गम्भीर रूप से बीमार होने का सप्रमाण पता 19 जनवरी को ही लग गया था। लेकिन अच्छे डॉक्टर का अपॉइंटमेंट लेने में 2-3 दिन लग ही गये।
मृदुभाषी, सुन्दर सी लेडी डॉक्टर रूचि प्रियदर्शनी (हालाँकि पहली विज़िट में चेहरे पर मॉस्क लगाये सुंदरता का सुनिश्चित उदघोष तो सम्भव नहीं था, पर देहयष्टि, आँखें आदि से यह तय था कि वह प्रियदर्शनी ही थी) ने बेहद रोषभरे स्वर में कहा- इतनी अच्छी पर्सनैलिटी और ये हाल इसका....मेरे पास अपनी लापरवाही का कोई माकूल जवाब नहीं था। प्रारम्भिक चेकअप के बाद उसने सांत्वना दी--बचाने की पूरी कोशिश करेंगे हम लोग.. बाक़ी तो ..बस..। अस्तांचल की ओर बढ़ते मेरे उम्मीद के सूरज में तनिक रौशनी का सूत्रपात हुआ। ख़ैर, एक्स रे पर एक्स रे.... एक्सपर्ट ओपिनियन... सीनियर डॉक्टर ने मुँह पिचकाते हुए कहा-- हूँ..उम्मीद तो कम ही है....... ....इंफेक्शन पूरी तरह फैल चुका है। फिर भी, एक बड़े एक्स रे के लिए रैफर करने पर सहमति बनी। जबकि ऑपरेशन की प्रक्रिया शुरू ही होने वाली थी, लोकल एनस्थीसिया दे दिया गया था। फिर वापसी.... महिला डॉक्टर ने अफ़सोस जताया, सॉरी, आज एनस्थीसिया इंजेक्शन यूँ ही झेलना पड़ा आपको।उम्मीद तो 10 परसेंट से ज्यादा नहीं है, फिर भी एक बार कोशिश में क्या बुराई है। डॉ0डोडा का लैब है करोलबाग में, मेट्रो पिलर 115 के सामने। फिर, रिपोर्ट के बाद देखते हैं... चिंता न करें, बचाने की पुरजोर कोशिश की जाएगी.।।
सोचा, 69वां गणतंत्र है, ये तो मना ही लें, अब जो होना है सो एक दिन बाद...चलो, 27 जनवरी को ये भी हुआ.... रजिस्ट्रेशन...टोकन...पेमेंट.... बड़ा सा कमरा...बड़ी सी मूविंग एक्सरे मशीन...दुबली पतली सी दक्षिण भारतीय एक्सरे टेक्नीशियन....29 को रिपोर्ट के साथ फिर वहीँ चित्रगुप्त रोड वाले वेलनेस सेंटर आया। लंच चल रहा था, डॉक्टर का समर्पण देखिये...सब्जी में डूबी उँगलियों से ही एक्सरे छत की ओर किया और, ,,, खाना भकोसती साथी डॉक्टरों की ओर देखती हुई बुदबुदाई.....उंहुं... नो चांस...। फिर बोली, आप जरा बाहर वेट करिए.. अभी बताते हैं।
चैम्बर से बाहर आ गया...क्या बताते हैं... बता तो दिया... ख़ैर, कुछ देर बाद मुझे भीतर बुलाकर एडवाइज की गई, यहाँ तो पॉसिबल न है, किसी बड़े गवर्मेंट हॉस्पिटल के लिए रैफर कर रही हूँ...बोलिये, आर एल एल या फिर जहां भी आपको ठीक लगे। बस्स... एक हफ़्ते की भाग-दौड़ दफ़्तर से छुट्टी...पैसा ख़र्चा... अब सरकारी बड़े अस्पताल जाओ। शायद, इसी पचड़े के कारण मोटे पैसेवाले लोग सीधे थ्री-फोर स्टार प्राइवेट हॉस्पिटल का ही रुख़ करते हैं।
ऐसे ही वक़्त में दोस्तों की याद आती है, याद आया, डॉ0संजय कँवर का, व्हाट्स एप पर फ्रेंड हैं... पिछली बार पांचेक साल पहले अम्बेडकर अस्पताल में भेंट हुई थी। धर्म राजनीति पर व्हाट्स एप पर ख़ूब फारवर्ड-फारवर्ड खेलते हैं हमलोग....डॉ0साहब बीजेपी के धुर विरोधी.... उनका बस चले, तो हर भगवा को तड़ीपार कर दें। पर, मतलब अपना था, सो फोन किया, मिलने का वक़्त माँगा। अब 2 फरबरी आ गई थी, बोले एक्सरे देखकर ही कुछ बताऊंगा, अब मैं भगवान महावीर हॉस्पिटल पीतमपुरा में हूँ । चलो पहले पूछ लिया, वरना मैं तो अम्बेडकर में ही ढूंढ़ता, ओह! सरकारी डॉक्टरों के भी तो तबादले होते हैं।
पहले दिन पहुँचने में देर हो गई, ओपीडी रजिस्ट्रेशन 12 बजे बन्द हो चुका था। कमरा न0112 में घुसा तो डॉ0साहब लंच के लिए जा रहे थे शायद...बेमन से नमस्ते हुई। चेहरे के भाव कुछ यूँ रहे होंगे...चल दिए मुँह उठा कर.. डॉक्टर तो जैसे इनके बाप का नौकर है... उसे खाने पीने का हक़ कहाँ है...। मैं इंतज़ार करता हूँ डॉक्टर साहब...कोई बात नहीं। अरे नहीं, आप बैठिये, मैं अभी आता हूँ, कहकर बन्दा निकल लिया। आधा घण्टे बाद अवतरित हुए, एक्सरे देखा तो तपाक से बोले, कोई फायदा नहीं। इसे जाना ही होगा। ऐसा करो, मंगल को आ जाओ... मैं करता हूँ। फिर एक नज़र मेरे उदास चेहरे पर डालते हुए बोले, ये दवाई 3-4 दिन ले लो... लिख दूँ ? मेरे मुँह में अल्फ़ाज़ न थे, सर हिला दिया सहमति में। भारी कदमों से वापिस आ गया। अब कोई उम्मीद न बची थी। ख़ैर, अब और क्या किया जा सकता है!!
दिल्ली के सरकारी अस्पताल के ओपीडी की लंबी क्यू से ख़ौफ़ खाकर सोमवार से ही ऑन लाइन रजिस्ट्रेशन के लिए यूजर आईडी बनाई, 6 फरबरी सुबह 7 बजे से ही कोशिश करके जैसे-तैसे रजिस्ट्रेशन हुआ। ऑफिस से सबकी शुभ कामनाएं लेकर निकला, फिर भी 12 बजे पहुँच पाया। इस पूरे दौरान एक व्यक्ति जो हर पल मेरे साथ परेशान और चिंतित रहा वो सिर्फ़ बब्बू ही था और दूसरा मैं...। प्रारम्भिक औपचारिकताएं.... कन्सेंट के दो पेज के छपे फार्म पर दस्तख़त ले लिए। घर का पता, पिता का नाम...वग़ैरह वग़ैरह... कुछ ऊँच-नीच हो तो किसे ख़बर करें...। डॉ0 संजय अपने जूनियर डॉ0को बीपी, एनस्थीसिया और बाक़ी डॉक्टरी भाषा में निर्देश देकर..कि तब तक मैं आता हूँ, निकल लिए। ख़ैर, 3-4 इंजेक्शन ठोक कर डॉ0ने एक नुकीला औज़ार चुभाते हुए पूछा--लग तो नहीं रहा है न ?? अब भैया, लग भी रहा होगा तो क्या कर लूँगा। मैंने निरीह भाव से सिर हिलाया। अब तो पूरी ताक़त से डॉ0 जुट गया, इधर कट तो ब्लड ही ब्लड... बीच बीच में मेरी पीड़ा का अनुभव करते हुए पूछता- खिंचाव ज्यादा तो नहीं हो रहा.... और फिर से प्रयास में जुट जाता। आधा घण्टे में मित्र डॉ0 संजय भी लौट आये--कहाँ तक पहुँचे??? ओके..गुड.. फिर कुछ पलों के लिए हरे पर्दे के उस पार अपने किसी सहयोगी से राजनीतिक चर्चा में लग गए-- ताज महोत्सव में राम लीला...भला ये भी कोई तुक है..ये देश का सत्यानाश कर के ही दम लेंगे...फिर भीतर आये । चलो छोड़ो, तुम लंच करो, मैं ही करता हूँ... तुमसे नहीं होगा। और, मॉस्क चढ़ाकर, ग्लव्ज़ पहिनकर संजय कँवर जी औज़ारों के साथ झुक गए। एक अदना से बीमार कमज़ोर दाँत की इतनी ज़ुर्रत.... डॉक्टर फुल फॉर्म में थे और मैं भगवान को याद कर रहा था। कुछ देर की जद्दो-जहद के बाद... पूरी ताक़त से ... जम्बुड़े की गिरफ़्त में लहूलुहान दाँत हवा में लहरा रहा था। उन्होंने गर्व से जूनियर डॉक्टर की ओर देखा... चलो, ड्रेसिंग कर दो।
उफ़्फ़... हर ख़ुशी हर दुःख की साथी ... खून से लथपथ वह मेरी दाढ़...बेजान सी में वेस्ट ट्रे में पड़ी छटपटा रही थी... कुछ हफ़्तों के साथी के बिछुड़ने पर भी अफ़सोस होता है...यह साथ तो 40-45 सालों से भी लम्बा था। मैंने एक गहरी निःश्वास ली। चेहरे की सूजन बता रही थी कि मक़तूल ने खुद को बचाने के लिए, कितनी बड़ी लड़ाई लड़ी है डॉक्टर और हथियारों से...मैंने हल्के से वाश बेसिन में खून के धब्बे साफ़ किये और भारी क़दमो से धीरे-धीरे बाहर आ गया। ये ज़ख्म भी भर जायेगा जो अभी हरा है... पर जो मेरी अपनी लापरवाही से हमेशा के लिए बिछड़ गया उसके यूँ जाने का दुःख अर्से तक सालता रहेगा, ये तय है.....।
--------- मनोज अबोध 6 फरबरी 2018
एक दोहा नाराज़ दोस्तों को समर्पित:
एक दोहा नाराज़ दोस्तों को समर्पित:::💑💑💑💑
यूँ तो कब का बन्द है, उससे हर संवाद ।
बतियाती है हर घड़ी, मुझसे उसकी याद।।
------- मनोज अबोध
यूँ तो कब का बन्द है, उससे हर संवाद ।
बतियाती है हर घड़ी, मुझसे उसकी याद।।
------- मनोज अबोध
Saturday, October 14, 2017
एक दोहा और
एक दोहा और भी देख लें मान्यवर
तय था आओगे नहीं, फिर भी बारम्बार ।
हर आहत पर चौंक कर, देखा मैंने द्वार ।।
---मनोज अबोध
तय था आओगे नहीं, फिर भी बारम्बार ।
हर आहत पर चौंक कर, देखा मैंने द्वार ।।
---मनोज अबोध
एक दोहा
एक दोहा यादों भरा....
मादक नयनों से तिरे, चख ली थी इकबार ।
उम्र हुई पर आज तक, उतरा नहीं ख़ुमार ।।
-----मनोज अबोध
मादक नयनों से तिरे, चख ली थी इकबार ।
उम्र हुई पर आज तक, उतरा नहीं ख़ुमार ।।
-----मनोज अबोध
Friday, September 29, 2017
एक ताज़ा ग़ज़ल
एक ताज़ा ग़ज़ल आपकी अदालत में========
हर क़दम अपने में सिमट कर भी
जी रहा हूँ सभी से कट कर भी
साथ चलने की बात करता था
उसने देखा नहीं पलट कर भी
उनके साँचे में ढल सके ही नहीं
हमने देखा बहुत सिमट कर भी
वो रुका ही नहीं, न रुकना था
कितना रोया उसे लिपट कर भी
सिर्फ़ तनहाई हाथ आई है
देखा तक़दीर को उलट कर भी
उलझनें सब सुलझ भी सकती थीं
सोचते तो ज़रा-सा हट कर भी
मुझको बस, तू दिखाई देता है
ख़्वाब क्या ख़्वाब से उचट कर भी
---------------मनोज अबोध
हर क़दम अपने में सिमट कर भी
जी रहा हूँ सभी से कट कर भी
साथ चलने की बात करता था
उसने देखा नहीं पलट कर भी
उनके साँचे में ढल सके ही नहीं
हमने देखा बहुत सिमट कर भी
वो रुका ही नहीं, न रुकना था
कितना रोया उसे लिपट कर भी
सिर्फ़ तनहाई हाथ आई है
देखा तक़दीर को उलट कर भी
उलझनें सब सुलझ भी सकती थीं
सोचते तो ज़रा-सा हट कर भी
मुझको बस, तू दिखाई देता है
ख़्वाब क्या ख़्वाब से उचट कर भी
---------------मनोज अबोध
Monday, July 31, 2017
एक मुक्तक
एक मुक्तक ....
चार पल की मुलाक़ात को ।
आपकी हर कही बात को ।
श्वांस से श्वांस का वो मिलन
याद करता हूँ उस रात को ।
चार पल की मुलाक़ात को ।
आपकी हर कही बात को ।
श्वांस से श्वांस का वो मिलन
याद करता हूँ उस रात को ।
Friday, July 7, 2017
एक दोहा
एक दोहा आप की नज़्र है---
उन लोगों की बात पर, कैसे करता गौर ।
भीतर से कुछ और जो, बाहर से कुछ और ।।
--मनोज अबोध
उन लोगों की बात पर, कैसे करता गौर ।
भीतर से कुछ और जो, बाहर से कुछ और ।।
--मनोज अबोध
आज का दोहा
आज के दोहे के साथ आपकी अदालत में----/
करते हैं जो स्वार्थ से, सम्बन्धों की माप ।
पछतावा होगा उन्हें, इक दिन अपनेआप।।
--मनोज अबोध
Tuesday, July 4, 2017
एक ताज़ा दोहे के साथ...
मेरे भीतर आ बसा, जब से तेरा रूप ।
पोर-पोर में खिल गई, मीठी-मीठी धूप ।।
*मनोज अबोध
Friday, March 17, 2017
न जाने कैसे
अच्छे से याद है मुझे
कमरे में घुसते ही
सटाक से कर लिया था दरवाज़ा बन्द
चढ़ा दी थी चिटकनी
लगा दी थी कुण्डी
कि/ चाह कर भी कोई
भीतर न आ सके ।
मगर न जाने कैसे...कब
मेरे साथ-साथ
बिस्तर तक चले आये
कई दुःख, कई चिन्ताएं
क्रोध के रेतीले झोंके
ईगो, पश्चाताप और यादें
उफ़...
एक मुलायम बिस्तर में
इतने कठोर सहवासी
वो भी इतने सारे...?
एकाएक आँखों में उग आई नागफ़नी
और/ करवटें बदलता रहा
मैं रातभर ..।।।।
कमरे में घुसते ही
सटाक से कर लिया था दरवाज़ा बन्द
चढ़ा दी थी चिटकनी
लगा दी थी कुण्डी
कि/ चाह कर भी कोई
भीतर न आ सके ।
मगर न जाने कैसे...कब
मेरे साथ-साथ
बिस्तर तक चले आये
कई दुःख, कई चिन्ताएं
क्रोध के रेतीले झोंके
ईगो, पश्चाताप और यादें
उफ़...
एक मुलायम बिस्तर में
इतने कठोर सहवासी
वो भी इतने सारे...?
एकाएक आँखों में उग आई नागफ़नी
और/ करवटें बदलता रहा
मैं रातभर ..।।।।
रिजेक्शन
दिलकश स्टाइल में
बाँध-गूँथ कर
महकते फूलों के
गुलदस्ते बेचते
माली की टोकरी में
बचे पड़े फूलों से पूछो-
क्या होता है
"रिजेक्शन" का दर्द !
बड़े से शो-रूम में
फोकस लाइटों के बीच
'न्यू अराइवल' के डिस्पले तले
करीने से हैंगर में इठलाती
खूबसूरत ड्रेस को
बड़े चाव और पसंद से
उठा लेने के बाद
प्राइज टैग
साइज़ की फिटिंग
या फिर
और बेहतरीन की चाहत में
गूचड़-माचड़ कर
स्टैंड या टोकरी में
वापस फेंक दिए जाने पर
उस ड्रेस से पूछना-
क्या होता है
"रिजेक्शन" का दर्द !
रूप, गुण, पसंद और
ट्रेण्ड के बावजूद
नकारे जाने की पीड़ा
नकारने वाला शायद ही
कभी समझ पाता हो ।।।
बाँध-गूँथ कर
महकते फूलों के
गुलदस्ते बेचते
माली की टोकरी में
बचे पड़े फूलों से पूछो-
क्या होता है
"रिजेक्शन" का दर्द !
बड़े से शो-रूम में
फोकस लाइटों के बीच
'न्यू अराइवल' के डिस्पले तले
करीने से हैंगर में इठलाती
खूबसूरत ड्रेस को
बड़े चाव और पसंद से
उठा लेने के बाद
प्राइज टैग
साइज़ की फिटिंग
या फिर
और बेहतरीन की चाहत में
गूचड़-माचड़ कर
स्टैंड या टोकरी में
वापस फेंक दिए जाने पर
उस ड्रेस से पूछना-
क्या होता है
"रिजेक्शन" का दर्द !
रूप, गुण, पसंद और
ट्रेण्ड के बावजूद
नकारे जाने की पीड़ा
नकारने वाला शायद ही
कभी समझ पाता हो ।।।
Sunday, March 12, 2017
Friday, January 27, 2017
अच्छा तो लगता है
अच्छा तो लगता है
जब धीरे से कोई कानों में
कह जाता है
प्यार के दो रसीले शब्द !
देर तक गूँजती रहती है उनकी प्रतिध्वनि
मन की दीवारों से टकरा कर !
गुंजायमान होता रहता है कोई चेहरा
मासूम खिलखिलाहट के साथ
मूक आमंत्रण-भरी आँखों का अबोलापन
एकाएक रोक देता है मेरे कदमों को
और, मैं
फिर से सुनने का प्रयास करने लगता हूँ
कानों में कहे गए
उन दो शब्दों को !!!
*******************
मनोज अबोध
जब धीरे से कोई कानों में
कह जाता है
प्यार के दो रसीले शब्द !
देर तक गूँजती रहती है उनकी प्रतिध्वनि
मन की दीवारों से टकरा कर !
गुंजायमान होता रहता है कोई चेहरा
मासूम खिलखिलाहट के साथ
मूक आमंत्रण-भरी आँखों का अबोलापन
एकाएक रोक देता है मेरे कदमों को
और, मैं
फिर से सुनने का प्रयास करने लगता हूँ
कानों में कहे गए
उन दो शब्दों को !!!
*******************
मनोज अबोध
Tuesday, January 24, 2017
आज एक ग़ज़ल
सकल श्रम आज निष्फल हो रहा है
ग़ज़ल के नाम पर छल हो रहा है
उधर वो विष उगलते जा रहे हैं
इधर मन है कि सन्दल हो रहा है
ज़रा-सी बात पर सर काट डाला
नगर अभिशप्त जंगल हो रहा है
लगाकर लाइनें कुछ फेसबुक पर
नया शायर मुकम्मल हो रहा है
कभी जो सोचकर दिल काँपता था
वही सब आज हर पल हो रहा है
करूँ कैसे नियन्त्रित इस हृदय को
तुम्हें देखा तो चंचल हो रहा है ।
वो जितनी देर करते जा रहे हैं
ये मन उतना ही बेकल हो रहा है
मुझे जेअन यू में दाख़िल कराओ
मेरा आदर्श अफ़ज़ल हो रहा है
***********************
ग़ज़ल के नाम पर छल हो रहा है
उधर वो विष उगलते जा रहे हैं
इधर मन है कि सन्दल हो रहा है
ज़रा-सी बात पर सर काट डाला
नगर अभिशप्त जंगल हो रहा है
लगाकर लाइनें कुछ फेसबुक पर
नया शायर मुकम्मल हो रहा है
कभी जो सोचकर दिल काँपता था
वही सब आज हर पल हो रहा है
करूँ कैसे नियन्त्रित इस हृदय को
तुम्हें देखा तो चंचल हो रहा है ।
वो जितनी देर करते जा रहे हैं
ये मन उतना ही बेकल हो रहा है
मुझे जेअन यू में दाख़िल कराओ
मेरा आदर्श अफ़ज़ल हो रहा है
***********************
:::मनोज अबोध
Monday, January 23, 2017
छोटी-बड़ी खुशी
अलग़-अलग़ होता है
सभी का पैमाना
जिनसे नापते हैं लोग
अपनी खुशियां !
कुछ हैं जो ख़ुश हो जाते हैं
छोटी-छोटी बातों में
उन्हें खुश रखने में
ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती
ऐसे लोगों के लिए
बहुत मायने रखती है छोटी-सी ख़ुशी भी !
साधारण सी बातों में ख़ुशी ढूंढ़ कर
खुश रहनेवाले इस दर्जे के लोगों के पास
इतनी खुशियां इकट्ठा हो जाती हैं कि
वे अपने आस-पास वालों को भी
गाहे-बगाहे बाँटते रहते हैं खुशियाँ !
अब मज़ा तो ये है कि
हर रोज़ हर पल
खुशियां बाँटने के बावजूद भी
कम नहीं होतीं इनकी खुशियाँ
बल्कि, इज़ाफ़ा ही होता रहता है कुछ-न-कुछ !
दूसरी तरफ़, ऐसे भी लोग हैं
जिनकी ख़ुशी का ग्राफ होता है
बहुत कॉम्प्लिकेटेड !
उन्हें ख़ुद मालूम नहीं होता कई बार
कि/ वे कैसे खुश हो सकते हैं ?
ऐसे लोगों को खुश करना
बहुदा होता है इतना मुश्किल
जैसे- पानी पर पानी लिखना !
ऐसा नहीं कि ये लोग
खुश होना नहीं चाहते
बस, इनकी ख़ुशियों का साइज़ जरा बड़ा होता है
अपनी बड़ी खुशियों को दिखाने के लिए
अक्सर रचते रहते हैं ये
बड़े-बड़े प्रपंच
बाकायदा बुलाते हैं तमाम नीयर-डीयर्स को
गवाही के लिए !
ख़र्च करते हैं बड़ी-बड़ी रक़म
दिखाने का सफ़ल-असफ़ल प्रयास करते हैं
बाक़ी को
कि/ तुम्हारी खुशियाँ
कितनी बोदी हैं, कितनी मलेच्छ
इनकी विशालकाय ख़ुशियों के सामने !!!
लेकिन, अगले ही पल
छूमंतर हो जाती हैं इनकी खुशियाँ
आयोजन का हिसाब-किताब करते वक़्त !
दुःखी हो जाते हैं
पर, मुस्कुराते हैं झूठमूठ सबके सामने !
वहीं, मुझ जैसे बहुत सारे लोग
धीरे से ढूंढ़ लेते हैं अपने स्तर की छोटी खुशियाँ
इन्ही बड़ी ख़ुशियों के शामियाने में
और चुपचाप खड़े हो जाते हैं एक कोने में
भीतर ही भीतर मुस्कुराते हुए
बगल में दबाये अपने हिस्से की ख़ुशी।
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सभी का पैमाना
जिनसे नापते हैं लोग
अपनी खुशियां !
कुछ हैं जो ख़ुश हो जाते हैं
छोटी-छोटी बातों में
उन्हें खुश रखने में
ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती
ऐसे लोगों के लिए
बहुत मायने रखती है छोटी-सी ख़ुशी भी !
साधारण सी बातों में ख़ुशी ढूंढ़ कर
खुश रहनेवाले इस दर्जे के लोगों के पास
इतनी खुशियां इकट्ठा हो जाती हैं कि
वे अपने आस-पास वालों को भी
गाहे-बगाहे बाँटते रहते हैं खुशियाँ !
अब मज़ा तो ये है कि
हर रोज़ हर पल
खुशियां बाँटने के बावजूद भी
कम नहीं होतीं इनकी खुशियाँ
बल्कि, इज़ाफ़ा ही होता रहता है कुछ-न-कुछ !
दूसरी तरफ़, ऐसे भी लोग हैं
जिनकी ख़ुशी का ग्राफ होता है
बहुत कॉम्प्लिकेटेड !
उन्हें ख़ुद मालूम नहीं होता कई बार
कि/ वे कैसे खुश हो सकते हैं ?
ऐसे लोगों को खुश करना
बहुदा होता है इतना मुश्किल
जैसे- पानी पर पानी लिखना !
ऐसा नहीं कि ये लोग
खुश होना नहीं चाहते
बस, इनकी ख़ुशियों का साइज़ जरा बड़ा होता है
अपनी बड़ी खुशियों को दिखाने के लिए
अक्सर रचते रहते हैं ये
बड़े-बड़े प्रपंच
बाकायदा बुलाते हैं तमाम नीयर-डीयर्स को
गवाही के लिए !
ख़र्च करते हैं बड़ी-बड़ी रक़म
दिखाने का सफ़ल-असफ़ल प्रयास करते हैं
बाक़ी को
कि/ तुम्हारी खुशियाँ
कितनी बोदी हैं, कितनी मलेच्छ
इनकी विशालकाय ख़ुशियों के सामने !!!
लेकिन, अगले ही पल
छूमंतर हो जाती हैं इनकी खुशियाँ
आयोजन का हिसाब-किताब करते वक़्त !
दुःखी हो जाते हैं
पर, मुस्कुराते हैं झूठमूठ सबके सामने !
वहीं, मुझ जैसे बहुत सारे लोग
धीरे से ढूंढ़ लेते हैं अपने स्तर की छोटी खुशियाँ
इन्ही बड़ी ख़ुशियों के शामियाने में
और चुपचाप खड़े हो जाते हैं एक कोने में
भीतर ही भीतर मुस्कुराते हुए
बगल में दबाये अपने हिस्से की ख़ुशी।
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अपनी खुशी
हर किसी की होती है अपनी खुशी
बिलकुल निजी
उसकी अपनी खुशी।
ज़रूरी नहीं
कि आप जिन चीजों से खुश हो जाते हों
सामने वाला भी उससे खुश हो
क्योंकि / अलग - अलग होती है
सबके लिए
ख़ुशी की परिभाषा ।
हाँ, अलग होते हुए भी
अगर कोई शामिल होता है आपकी ख़ुशी में
या, समझता है आपकी ख़ुशी को
अपनी ख़ुशी
तो ये बड़ी बात है !
निःसन्देह आप भाग्यशाली हैं
लेकिन, ये हर बार या हमेशा नहीं हो सकता
इसलिए मत लेना इसे कभी
टेकेन एज़ ग्रांटेड
वरना, ये भी हो सकता है कि
आपकी रही-सही ख़ुशी भी मुरझा जाए !
ये तो आप बख़ूबी जानते ही हैं
ख़ुशी हो या फूल
मुरझा जाए तो फिर से खिलाने में
करनी पड़ती है कड़ी मशक्कत !
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बिलकुल निजी
उसकी अपनी खुशी।
ज़रूरी नहीं
कि आप जिन चीजों से खुश हो जाते हों
सामने वाला भी उससे खुश हो
क्योंकि / अलग - अलग होती है
सबके लिए
ख़ुशी की परिभाषा ।
हाँ, अलग होते हुए भी
अगर कोई शामिल होता है आपकी ख़ुशी में
या, समझता है आपकी ख़ुशी को
अपनी ख़ुशी
तो ये बड़ी बात है !
निःसन्देह आप भाग्यशाली हैं
लेकिन, ये हर बार या हमेशा नहीं हो सकता
इसलिए मत लेना इसे कभी
टेकेन एज़ ग्रांटेड
वरना, ये भी हो सकता है कि
आपकी रही-सही ख़ुशी भी मुरझा जाए !
ये तो आप बख़ूबी जानते ही हैं
ख़ुशी हो या फूल
मुरझा जाए तो फिर से खिलाने में
करनी पड़ती है कड़ी मशक्कत !
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Thursday, January 19, 2017
एक कविता
एक अदृश्य बोझ है
जो ज़्यादातर लमहों में
रहता है मेरे सिर पर सवार !
बहुत चाहता हूँ कि
उतार फेंकूँ सिर से
अनवरत समस्याओं का ये बोझा
प्रयास करता रहता हूँ
और कुछ नहीं तो, कुछ वज़न ही कम हो
कुछ तो हल्की हो खोपड़ी !
एक पल को लगता है कि
रंग ला रही है मेहनत
शायद, अब, इतने कुछ के बाद
कम हो जायेगा ये बोझा
झटक सकूँगा बरसों से अकड़ी गर्दन को
घुमा सकूँगा खोपड़ी दाँये बाँये
देख सकूँगा स्फारित नेत्रों से
आसपास के परिदृश्य को
लेकिन अगले ही पल
छूमंतर हो जाता है हल्के होने का यह अहसास
कोई दूसरी समस्या धीरे से सरक कर पैठ जाती है
सिर पर मौजूद पोटली में
और फ़िर, ज्यों का त्यों,
या कई बार तो पहले से भी अधिक बढ़ जाता है ये बोझ
लगता है अक्सर
अब नहीं सम्हाल पाउँगा इतना वज़न
गिर जाऊँगा लड़खड़ा कर
लेकिन अगले ही पल
पूरी ऊर्जा के साथ
करता हूँ एक नई कोशिश
खुद को खड़े रखने की
मुस्कुराता हूँ बे-वजह
उचकाता हूँ बोझ से दबी
अकड़ी हुई गर्दन को
संतुलित करने का विफल-सा प्रयास करता हूँ
कंपकंपाती हुई टांगों को
जानी-अनजानी भीड़ के बीच
शायद , डरता हूँ बिखरने से
या, डरता हूँ गिरने से
या फिर, नहीं देना चाहता कोई मौका
मुझपर ठट्ठा मारने को तैयार खड़े मेरे अपनों को !!
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जो ज़्यादातर लमहों में
रहता है मेरे सिर पर सवार !
बहुत चाहता हूँ कि
उतार फेंकूँ सिर से
अनवरत समस्याओं का ये बोझा
प्रयास करता रहता हूँ
और कुछ नहीं तो, कुछ वज़न ही कम हो
कुछ तो हल्की हो खोपड़ी !
एक पल को लगता है कि
रंग ला रही है मेहनत
शायद, अब, इतने कुछ के बाद
कम हो जायेगा ये बोझा
झटक सकूँगा बरसों से अकड़ी गर्दन को
घुमा सकूँगा खोपड़ी दाँये बाँये
देख सकूँगा स्फारित नेत्रों से
आसपास के परिदृश्य को
लेकिन अगले ही पल
छूमंतर हो जाता है हल्के होने का यह अहसास
कोई दूसरी समस्या धीरे से सरक कर पैठ जाती है
सिर पर मौजूद पोटली में
और फ़िर, ज्यों का त्यों,
या कई बार तो पहले से भी अधिक बढ़ जाता है ये बोझ
लगता है अक्सर
अब नहीं सम्हाल पाउँगा इतना वज़न
गिर जाऊँगा लड़खड़ा कर
लेकिन अगले ही पल
पूरी ऊर्जा के साथ
करता हूँ एक नई कोशिश
खुद को खड़े रखने की
मुस्कुराता हूँ बे-वजह
उचकाता हूँ बोझ से दबी
अकड़ी हुई गर्दन को
संतुलित करने का विफल-सा प्रयास करता हूँ
कंपकंपाती हुई टांगों को
जानी-अनजानी भीड़ के बीच
शायद , डरता हूँ बिखरने से
या, डरता हूँ गिरने से
या फिर, नहीं देना चाहता कोई मौका
मुझपर ठट्ठा मारने को तैयार खड़े मेरे अपनों को !!
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Saturday, January 14, 2017
अभिसार
चाहता हूँ
बनो तुम फिर से
अभिसारिका !
त्रियोदशी के चाँद की मद्धम रौशनी में
नमूदार होता
तुम्हारा रसवंती चेहरा....
महुए की ताज़ा शराब-सा गंधाता
तुम्हारा जिस्म.....
रोक ले मेरे बौराये क़दमो को ।
नर्मदा के रेत में घुटनों के बल बैठकर
संवारू तुम्हारी घुँघराली अलकों को..
गूँथ दूँ
वनपुष्पों की एक माला !
जिसकी गंध घुलमिल जाए
तुम्हारे लरज़ते अधरों से छलकती
शबनमी बूंदों से ।
भर लूँ चुल्लू में
इस चाँद के निर्झर को
और / अमृत्व की चाहत में
सुड़प कर के पी जाऊं !
या/ रेत की ओसभीगी चादर पर अधलेटी
तुम्हारी देहयष्टि का समीकरण
हल करूँ त्रिकोणमिति के सिद्धांत से !
देह की पखावज पर
अंगुलयों के पोरों से
छेडूं
राग यमन , जो तब्दील हो जाये
रात्रि के चरम पर
रागेश्वरी की तान में ।
और, साष्टांग हो जाऊं मैं
बिखरे रेत-कणों के वक्ष पर।।
टूटन भरे जिस्मों को
जगाये जब भोर की पहली किरण....
तुम देखो मेरी तरफ़
अजनबी निगाहों से !
****************
बनो तुम फिर से
अभिसारिका !
त्रियोदशी के चाँद की मद्धम रौशनी में
नमूदार होता
तुम्हारा रसवंती चेहरा....
महुए की ताज़ा शराब-सा गंधाता
तुम्हारा जिस्म.....
रोक ले मेरे बौराये क़दमो को ।
नर्मदा के रेत में घुटनों के बल बैठकर
संवारू तुम्हारी घुँघराली अलकों को..
गूँथ दूँ
वनपुष्पों की एक माला !
जिसकी गंध घुलमिल जाए
तुम्हारे लरज़ते अधरों से छलकती
शबनमी बूंदों से ।
भर लूँ चुल्लू में
इस चाँद के निर्झर को
और / अमृत्व की चाहत में
सुड़प कर के पी जाऊं !
या/ रेत की ओसभीगी चादर पर अधलेटी
तुम्हारी देहयष्टि का समीकरण
हल करूँ त्रिकोणमिति के सिद्धांत से !
देह की पखावज पर
अंगुलयों के पोरों से
छेडूं
राग यमन , जो तब्दील हो जाये
रात्रि के चरम पर
रागेश्वरी की तान में ।
और, साष्टांग हो जाऊं मैं
बिखरे रेत-कणों के वक्ष पर।।
टूटन भरे जिस्मों को
जगाये जब भोर की पहली किरण....
तुम देखो मेरी तरफ़
अजनबी निगाहों से !
****************
माज़ा देव
कोल्हापुर से पुणे जाते हुए
कुछ देर देखता रहा
तेजी से पीछे छूटते शहर को
फिर,
अनायास मेरी नज़रें पड़ीं
कार के विंडस्क्रीन से झूलते
मिनिएचर पर ।
कुछ नई बात तो नहीं, हर कोई-
अपनी पसंद,
अपनी आस्था के मुताबिक
लटका ही लेता है
कोई न कोई मिनिएचर !
हवा में उड़ते हनुमान हों
साईं बाबा, गणपति बप्पा, तिरुपति महाराज
या फिर, पर्सनलाइज कोई देवी देवता।
मगर, इस कार के मास्टर मिरर से लटका था-
एक जोड़ी कोल्हापुरी चप्पलों का मिनिएचर ।
एक ढाबे पर चाय के लिए रुके
तो मैंने पूछ ही लिया-
वो मुस्कुराया।
ज़रा गर्व से बोला-
साहेब, इसी चमड़े से भरता है मेरे परिवार का पेट
इन्ही कोल्हापुरी चप्पलों से चलती है हमारी रोज़ी-रोटी
माज़ा देव हच आहे !!
(हमारा तो भगवान यही है)
********************
कुछ देर देखता रहा
तेजी से पीछे छूटते शहर को
फिर,
अनायास मेरी नज़रें पड़ीं
कार के विंडस्क्रीन से झूलते
मिनिएचर पर ।
कुछ नई बात तो नहीं, हर कोई-
अपनी पसंद,
अपनी आस्था के मुताबिक
लटका ही लेता है
कोई न कोई मिनिएचर !
हवा में उड़ते हनुमान हों
साईं बाबा, गणपति बप्पा, तिरुपति महाराज
या फिर, पर्सनलाइज कोई देवी देवता।
मगर, इस कार के मास्टर मिरर से लटका था-
एक जोड़ी कोल्हापुरी चप्पलों का मिनिएचर ।
एक ढाबे पर चाय के लिए रुके
तो मैंने पूछ ही लिया-
वो मुस्कुराया।
ज़रा गर्व से बोला-
साहेब, इसी चमड़े से भरता है मेरे परिवार का पेट
इन्ही कोल्हापुरी चप्पलों से चलती है हमारी रोज़ी-रोटी
माज़ा देव हच आहे !!
(हमारा तो भगवान यही है)
********************
कविता 3
वे कौन लोग थे
जो अलसुबह जगा कर मुझे
पूछ रहे थे-कि
मेरा तुम्हारा रिश्ता क्या है ?
मैं बताना चाहता था
वही रिश्ता है- जो
नींद का होता है शरीर से !
रिश्तों की पड़ताल करने वालों
अपने शरीर की ज़रा सुध लो
क्यों उचट जाती है तुम्हारी नींद
क्यों तुम्हे रात-रात नींद नहीं आती है !
*****************************
जो अलसुबह जगा कर मुझे
पूछ रहे थे-कि
मेरा तुम्हारा रिश्ता क्या है ?
मैं बताना चाहता था
वही रिश्ता है- जो
नींद का होता है शरीर से !
रिश्तों की पड़ताल करने वालों
अपने शरीर की ज़रा सुध लो
क्यों उचट जाती है तुम्हारी नींद
क्यों तुम्हे रात-रात नींद नहीं आती है !
*****************************
एक कविता और......
कितना सही हूँ मैं ?
मैं नहीं जानता !
कितना ग़लत हूँ मैं
यह मालूम है मुझे !
एक बड़ा झुण्ड
जो एक्टिव है हर पल
मेरे चारों तऱफ
भिन्न भिन्न कोटियों वाले
ग़लती मापक यंत्रों के साथ !
इससे पहले कि
अलग स्टैंडर्ड अलग स्केल के
त्रुटि मापक यंत्रों के
उल्टे सीधे परिणाम का हवाला देकर
वे दबा दें मेरी हैसियत को
गलतियों के कमरतोड़ बोझ तले
ज़रूरी था
कि सजग रहूँ मैं ख़ुद
अपनी ग़लतियों के प्रति !
शायद, इसीलिए जानता हूँ मैं
अपनेआप को
जब जब करता हूँ
गलतियां !!!
*************
एक कविता
हाँ, मुझे पसंद है
यायावरी
घूमना-फिरना, सैर-सपाटा
पर्यटन
टोहना अनजान रास्तों को
महसूसना भिन्न संस्कृतियों को
देखना /अलग अलग़ जीवन शैलियों में
रचे बसे लोगों को !
गले मिलना/ प्रकृति के विविध रूपों से
बेहद पसंद है मुझे !!!
लेकिन ???
बेतरतीब, बेमानी,दिखावटी
रिश्तों को ढोते झुण्ड के साथ तो बिलकुल भी नहीं।
बौद्धिक तार्किकता
वैचारिक समरसता
और / आयनिक सकारात्मकता के साथ
भले ही, सिर्फ़ एक साथी हो
सफ़र का पल पल
अक्षुण्ण अनुभव में बदल जाता है
फिर थकते नहीं हैं क़दम
बढ़ते जाते हैं एक नई ऊर्जा के साथ
खंगालने को एक नई दुनिया
एक नए अहसास के साथ।
***********************
यायावरी
घूमना-फिरना, सैर-सपाटा
पर्यटन
टोहना अनजान रास्तों को
महसूसना भिन्न संस्कृतियों को
देखना /अलग अलग़ जीवन शैलियों में
रचे बसे लोगों को !
गले मिलना/ प्रकृति के विविध रूपों से
बेहद पसंद है मुझे !!!
लेकिन ???
बेतरतीब, बेमानी,दिखावटी
रिश्तों को ढोते झुण्ड के साथ तो बिलकुल भी नहीं।
बौद्धिक तार्किकता
वैचारिक समरसता
और / आयनिक सकारात्मकता के साथ
भले ही, सिर्फ़ एक साथी हो
सफ़र का पल पल
अक्षुण्ण अनुभव में बदल जाता है
फिर थकते नहीं हैं क़दम
बढ़ते जाते हैं एक नई ऊर्जा के साथ
खंगालने को एक नई दुनिया
एक नए अहसास के साथ।
***********************
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