Sunday 13 June 2010

न जाने क्‍यों .......

न जाने क्‍यों.....

मुंह अंधेरे
अलसायी आंखों के साथ
एकदम एकाकी
मुन्‍नी के आने से भी पहले
जूझने लग जाती हो तुम....
जाग जाती है बहुत पहले
तुम्‍हारी दुनिया...
मेरी दुनिया में जब
भोर की पहली किरन भी नहीं पड़ती
तब.. घरघरा उठती है
तुम्‍हारे कुकर की सीटी...
फैल जाती है रसोई से
लिविंग रूम तक
तुम्‍हारे बनाए खास मसालों की भीनी खुश्‍बू
जबकि
तुम्‍हारी दुनिया के सभी दोस्‍त
हनुमान ट्वीटी गोगो बिल्‍ला
झूम उठते हैं
सुबह के खाने की
उस ताज़गीभरी खुश्‍बू से....
पर, मेरी दुनिया तक नहीं आ पाती
वो भीनी खुश्‍बू
न जाने क्‍यों....

मुन्‍नी को
अगली सुबह के लिए पकाई जाने वाली
सब्जियों को
काटने का निर्देश देकर
बैठती हो चुपचाप जब
लेकर सुबह के नाश्‍ते का डब्‍बा....
उदासी की एक बारीक लकीर
खिंच जाती है-
गमले के पौधों से लेकर
डाइनिंग हॉल की खिड़की तक....
लेकिन
उदासी की वो लकीर
नहीं पहुंच पाती मेरी आंखों तक..
न जाने क्‍यों ...
टीवी लैपटॉप पैक्‍टेबल
की झाड़-पौंछ के बीच
बैडरूम की खिड़की से जब
कुछ पलों के लिए
देखती हो
पार्क में बतियाते-मुस्‍कुराते
पेड़ पौधों को..
अपलक चुपचाप..
ठीक उसी पल
भावशून्‍यता का एक तीखा झोंका
गुजर जाता है
तुम्‍हे छू कर...
सावधान मुद्रा में खड़े
सेमल के वृक्ष तक...
ऐसी ही भावशून्‍यता हालांकि
बहुतायत में फैली रहती है
मेरी दुनिया में भी
लेकिन, तुम्‍हारी भावशून्‍यता का
तीखा झोंका
मेरी दुनिया के पेड़ पौधों तक
फिर भी नहीं पहुंच पाता
इसीलिए शायद
डाइनिंग टेबल के कोने पर सजी
मेरी तसवीर पर
नज़र पड़ते ही
अब नहीं फैलती
बरबस ही...
तुम्‍हारे चेहरे पर
मुस्‍कुराहट की कोई लकीर...
यानि/कहनेभर को हैं हम
एक ही दुनिया के बाशिन्‍दे
बल्कि
बहुत, बहुत मायनो में
अलग है हम दोनों की दुनिया
फर्क बस,इतना भर है
तुम्‍हारी दुनिया में
हर तरफ रची-बसी है
मेरी खुश्‍बू
लेकिन मेरी दुनिया के किसी भी कोने में
नहीं बसा है
तुम्‍हारे होने का अहसास...
सिर्फ मेरी आंखों को छोड़कर...
न जाने क्‍यों.
....।।।।।।।
मनोज अबोध
13 जून 2010

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