Wednesday 20 October 2010

करता भी क्‍या ............

रास्‍ता पग पग मिला कांटों भरा करता भी क्‍या
मुझको तो हर हाल में चलना ही था, करता भी क्‍या

मैं न तो घर का ही रह पाया, न पूरा घाट का
मेरी गलती की मिली मुझको सजा, करता भी क्‍या

नींद का आंखों से रिश्‍ता निभ न पाया उम्र भर
भाग्‍य में था रतजगा ही रतजगा करता भी क्‍या

मुझको कब आभास था सच बोलना अपराध है
माननी मुझको पड़ी अपनी ख़ता करता भी क्‍या

उसके हाथों कत्‍ल होने के सिवा चारा न था
ये गलत था तो सही तू ही बता, करता भी क्‍या

मैं निशाने पर सभी के आ गया अब तो अबोध
हर तरफ़ से तीर मुझ पर ही चला करता भी क्‍या

3 comments:

RUBY said...

naharo se dar kr noka par nahi hoti, himmat karnewalo ki har nahi hoti.my darling husband, as a person u r very romentic.pls write some romentic poem as u always wisper in phone. iam far off from you.but not by heart dear.luv you.

RUBY said...

naharo se dar kr noka par nahi hoti, himmat karnewalo ki har nahi hoti.my darling husband, as a person u r very romentic.pls write some romentic poem as u always wisper in phone. iam far off from you.but not by heart dear.luv you.

Kunwar Kusumesh said...

आपकी ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी और ब्लॉग पर पहली मुलाक़ात भी.
वैसे तो मुलाक़ात है ही, क्या कहने आपकी गजलों के. वाह.

कुँवर कुसुमेश