Wednesday, 20 October, 2010

मां ने कितना चाहा था------------

इक अच्‍छा इंसान बनूं मैं
मां ने कितना चाहा था ।
जीवन में आगे निकलूं मैं
मां ने कितना चाहा था ।

पुरखों की पावन खुश्‍बू से
नित जो महका करता था
उस आंगन के बीच रहूं मैं
मां ने कितना चाहा था ।

हर सुन्‍दर लड़की से मिलकर
सपने बुनने लगती थी
उसके मन का ब्‍याह करूं मैं
मां ने कितना चाहा था ।

ख़त लिख‍ने का वक्‍त नहीं जो
इतना तो कर सकता हूं
पलभर उसको फोन करूं मैं
मां ने कितना चाहा था ।

बाबू जी गुज़रें हैं जबसे
घर खाली सा लगता है
कुछ दिन उसके साथ रहूं मैं
मां ने कितना चाहा था ।

साल हुआ तुम सब को देखे
दीवाली पर आ जाऊं
घर आंगन में दीप धरूं मैं
मां ने कितना चाहा था ।

किस चिंता में घुलकर बेटा
हंसना भूल गया है तू
अपने दिल की बात कहूं मैं
मां ने कितना चाहा था ।

एक अकेली बूढ़ी घर में
सर टकराती रहती है
कुछदिन अपने साथ रखूं मैं
मां ने कितना चाहा था ।
सच ,
मां ने कितना चाहा था ।।।



1 comment:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

माँ तो हमेशा यही चाह्ती है। कि उसके बच्चे सुखी रहे।