Wednesday, October 20, 2010

तीन मुक्‍तक

कि हम वो हैं जो हर
तूफान का रूख मोड़ देते हैं
उन्‍हे अपना बनाते हैं
जिन्हें सब छोड़ देते हैं
हमेशा जीत हो मैदान में
मुमकिन नहीं लेकिन
समय हो साथ तो
शीशे भी पत्‍थर तोड़ देते हैं ।
0000000000000000
वफ़ा की दोस्‍ती की
हर कसम को तोड़ देते हैं
पकड़कर हाथ जाने लोग
कैसे छोड़ देते हैं
जिसे कहते हैं अपना भाई
सीने से लगाते हैं
उसी भाई से अखबारों में
रिश्‍ता तोड़ देते हैं ।।
000000000000000
सभी के साथ कुछ रिश्‍ता
निभाना भी जरूरी है
हमे है फिक्र उसकी
ये दिखाना भी जरूरी है
न मैं अभिमान करता हूं
मगर सम्‍मान की खातिर
मैं क्‍या हूं कौन हूं, इतना
बताना भी जरूरी है ।।।।

4 comments:

अशोक बजाज said...

बेहतरीन पोस्ट .बधाई !

Anonymous said...

bahu hi badhiya
pranam

मनोज कुमार said...

अच्छा लगा पढना।

sada said...

हमे है ि‍फक्र उसकी
ये दिखाना भी जरूरी है
न मैं अभिमान करता हूं
मगर सम्‍मान की खातिर
मैं क्‍या हूं कौन हूं, इतना
बताना भी जरूरी है ।।

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द एंव भाव ।