Wednesday, 20 October, 2010

आज जो हंसकर मिला

आज जो हंसकर मिला कल उसका तेवर और हो ।
ये न हो मंज़र के पीछे कोई मंज़र और हो ।।

एक ने गुमराह कर डाला तुझे तो क्‍या हुआ
मंज़िलों का जो पता दे कोई रहबर और हो ।।

मैंने शक जिसपर किया, हो दोष उसका भी नहीं
क्‍या पता सीने में उतरा कोई खंजर और हो ।।

एक मौका हाथ से छूटा तो मत अफसोस कर
तुझको जो ऊंचाइयां दे, कोई अवसर और हो ।।

तू अगर संघर्ष से पीछे हटा तो, सोच ले
ये भी हो सकता है हालत,और बदतर, और हो ।।

ये हकीकत है कि मैं जीता नहीं उससे कभी
पर तमन्‍ना है कि उससे एक टक्‍कर और हो ।।

तू नज़र का दायरा सीमित न कर मुझ तक अबोध
ये भी हो सकता है मुझसे कोई बेहतर और हो ।।

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