Monday, 27 May, 2013

एक ग़ज़ल...............

अंगारों के बीच पला मैं 
अपनी लौ में आप जला मैं

वो कमियाँ तो हैं मुझमें भी
किसको देता दोष भला मैं

हर दिन झेली अग्नि परीक्षा
किस किस मुश्किल से निकला मैं

जो ख़ुद अपने साथ नहीं थे
उनके भी तो संग चला मैं

वक्त के साथ बँधा था मैं भी
धूप ढली तो साथ ढला मैं
       ----- मनोज अबोध

Monday, 13 May, 2013

एक ग़ज़ल-----------------------------

क्या बताऊँ कि मेरे साथ वो क्या क्या चाहे
वो न तितली न तो जुगनू न ही तारा चाहे

अक्स बनके कभी अहसास में बसना चाहे
फूल बनके कभी कदमों में बिखरना चाहे

जानता वो भी है अब थक गए बाजू मेरे
अपने पंखों पे मुझे लेके वो उड़ना चाहे

अलविदा कह चुका है अपने सभी ख्वाबों को
जो मेरी आँख में है बस, वही सपना चाहे

मेरे कदमों में सिमटने लगी रफ्तार मेरी
और वो है कि मेरे साथ ही चलना चाहे

मोम की नाव में विश्वास का चप्पू लेकर
आग के दरिया से वो पार उतरना चाहे
                -------- मनोज अबोध

Tuesday, 7 May, 2013

आज की ग़ज़ल------

कैसे कैसे मंज़र हैं
घर वाले भी बेघर हैं

जिनको भीतर होना था
ज्यादातर सब बाहर हैं

हो लेते हैं सोच के खुश
हम कितनो से बेहतर हैं

दुख में जोर से हँसता हूँ
अपने अपने तेवर हैं

जिनको गुज़रे युग बीते
वे सब मेरे भीतर हैं 

दुनिया में है रक्खा क्या
कुछ मोती कुछ पत्थर हैं
    -------- मनोज अबोध