Friday, March 17, 2017

न जाने कैसे

अच्छे से याद है मुझे
कमरे में घुसते ही
सटाक से कर लिया था दरवाज़ा बन्द
चढ़ा दी थी चिटकनी
लगा दी थी कुण्डी
कि/ चाह कर भी कोई
भीतर न आ सके ।
मगर न जाने कैसे...कब
मेरे साथ-साथ
बिस्तर तक चले आये
कई दुःख, कई चिन्ताएं
क्रोध के रेतीले झोंके
ईगो, पश्चाताप और यादें
उफ़...
एक मुलायम बिस्तर में
इतने कठोर सहवासी
वो भी इतने सारे...?
एकाएक आँखों में उग आई नागफ़नी
और/ करवटें बदलता रहा
मैं रातभर ..।।।।

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (19-03-2017) को

"दो गज जमीन है, सुकून से जाने के लिये" (चर्चा अंक-2607)

पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'